सेवाजोहार (डिंडोरी): – मां नर्मदा की परिक्रमा… सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि आस्था, तप और धैर्य की परीक्षा है। घने जंगल, सुनसान रास्ते, दूर-दूर तक कोई गांव नहीं… ऐसे दुर्गम पथों पर जब कदम थकने लगते हैं और गला सूखने लगता है, तब किसी अपने का मिल जाना ईश्वर का प्रसाद लगता है।
इन्हीं कठिन रास्तों पर बीते पाँच दिनों से केवलारी सेवा आश्रम से जुड़े सेवादार मां नर्मदा के परिक्रमावासियों के लिए देवदूत बनकर खड़े हैं। अमरकंटक से डिंडोरी और डिंडोरी से शहपुरा के बीच फैले जंगली इलाकों में, जहाँ मानव बस्ती का नामोनिशान तक नहीं, वहां प्रेम, करुणा और सेवा की अलख जलाए ये सेवादार निःशुल्क भोजन और शुद्ध जल उपलब्ध करा रहे हैं।

अपने ही खर्चे से तैयार किया गया वेजिटेबल पुलाव, फलाहारी सामग्री और निर्मल जल… कोई दिखावा नहीं, कोई प्रचार नहीं। न कैमरा, न मंच, न तालियां—बस मां नर्मदा के नाम पर सेवा। यही इन सेवादारों की पहचान है।
सबसे बड़ी बात यह कि ये सेवा वर्षों से निरंतर चल रही है। बिना किसी अपेक्षा के, बिना किसी प्रसिद्धि की चाह के। सेवा को ही साधना मानने वाले ये सेवादार यह साबित कर रहे हैं कि आज भी इंसानियत जिंदा है।
मां नर्मदा की परिक्रमा कर रहे परिक्रमावासियों की आंखें उस वक्त नम हो जाती हैं, जब वे कहते हैं—
“डिंडोरी के पानी में सिर्फ शुद्धता नहीं, श्रद्धा है… सुमिरन है… और प्रेमभाव है। यहाँ सेवा इंसान नहीं, ईश्वर स्वयं करते हैं।”
वाकई, जहां रास्ते खत्म हो जाते हैं, वहीं केवलारी सेवा आश्रम के सेवादारों की सेवा शुरू होती है… और यहीं से इंसान को ईश्वर के सबसे करीब होने का एहसास होता है।