Saturday, October 10, 2026

भाजपा के पार्षदों और अध्यक्ष के कामकाज से नाराजगी, फिर भी क्या भाजपा के हाथ आएगी नगर की सत्ता?

डिंडौरी नगर की सियासत में एक बड़ा सवाल—भाजपा के खिलाफ माहौल है या विपक्ष की कमजोरी के कारण फिर आसान होगी जीत?
सेवाजोहार (डिंडौरी):- डिंडौरी नगर की राजनीति इन दिनों एक ऐसे सवाल के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है, जिसका जवाब आने वाले चुनाव में मतदाता देंगे। नगर में भाजपा के पार्षदों और नगर परिषद अध्यक्ष के कामकाज को लेकर विरोध और नाराजगी की चर्चाएं लगातार सामने आती रही हैं। कई मुद्दों पर जनता की शिकायतें भी हैं और स्थानीय स्तर पर भाजपा के कामकाज को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इसके बावजूद क्या आगामी नगर निकाय चुनाव में भाजपा एक बार फिर बढ़त बनाने में सफल होगी?
दिलचस्प बात यह है कि भाजपा के सामने जहां सत्ता में रहते हुए अपने कामकाज का हिसाब जनता के सामने रखने की चुनौती है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के सामने उससे भी बड़ी चुनौती एक मजबूत और सक्रिय विपक्ष के रूप में मैदान में उतरने की है। जिसको लेकर दूर दूर कोई आसार दिखाई नहीं दे रहे।
भाजपा के खिलाफ नाराजगी, लेकिन क्या उसे वोट में बदल पाएगा विपक्ष?
नगर में सड़क, नाली, सफाई, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था सहित स्थानीय विकास से जुड़े कई मुद्दे समय-समय पर चर्चा में रहे हैं। भाजपा के पार्षदों और नगर परिषद के कामकाज को लेकर लोगों की नाराजगी अगर वास्तव में जमीन पर मौजूद है, तो सवाल यह है कि इस नाराजगी को राजनीतिक विकल्प में बदलने का काम कौन करेगा ? भविष्य में होने वाले चुनाव की सारी जिम्मेदारी डिंडोरी विधायक अपने कंधे में ले रखे हैं इसी को नगर की जनता बड़ी गलती मान रही हैं! नगर में बगैर मजबूत टीम के कांग्रेस के लिए नगर की सत्ता हासिल करना बड़ी चुनौती माना जा रहा हैं,अगर चुनाव आज के समय में होते है तो कांग्रेस के पास सक्रिय, मजबूत और बड़ी टीम नदारद हैं? वही भाजपा को इसका फायदा लेना हैं तो उन्हें न सिर्फ अपनी कार्यशैली सुधारनी पड़ेगी बल्कि नए और सक्रिय चेहरों के साथ जनता के बीच वार्ड वार्ड पहुंचना पड़ेगा।
यहीं कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है
राजनीति में केवल सत्ता पक्ष से नाराजगी होना ही पर्याप्त नहीं होता। उस नाराजगी को वोट में बदलने के लिए विपक्ष को जनता के बीच जाना पड़ता है, समस्याओं को लगातार उठाना पड़ता है और मतदाताओं के सामने एक भरोसेमंद विकल्प रखना पड़ता है। ऐसे समय में जब कांग्रेस के पास डिंडोरी नगर में मजबूत टीम की कमी हैं,सक्रिय नेताओं में शिवराज जीतू ठाकुर,ज्योतिरादित्य भलावी ,सेफी खान और अतुल जैन के अलावा कोई खास चेहरा दिखाई नहीं देता। डिंडोरी में नगर की जनता की नजरों में मजबूत विपक्ष नजर नहीं आ रहा हैं। वही डिंडोरी विधायक ओमकार सिंह मरकाम के पास ही कांग्रेस जिला अध्यक्ष की कमान हैं,जिन्होंने अब तक कांग्रेस संगठन को नगर से लेकर ब्लॉक और जिले तक मजबूत करने के कोई ठोस प्रयास नहीं किए। ऐसे में देखना होगा कि आगामी समय में नगर परिषद चुनाव में हालात कांग्रेस के कैसे बदलते हैं!
डिंडौरी में कांग्रेस की सक्रियता पर उठ रहे सवाल
डिंडौरी नगर में कांग्रेस की स्थानीय टीम की सक्रियता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। क्या कांग्रेस लगातार वार्डों में जाकर जनता की समस्याएं सुन रही है? क्या भाजपा के नगर निकाय के कामकाज की कमियों को दस्तावेजों और तथ्यों के साथ जनता के सामने रखा जा रहा है? क्या प्रत्येक वार्ड में कांग्रेस का संगठन सक्रिय दिखाई दे रहा है?
अगर इन सवालों का जवाब कमजोर है, तो भाजपा के खिलाफ संभावित नाराजगी का राजनीतिक लाभ कांग्रेस को कैसे मिलेगा?
यही वजह है कि नगर की सियासत में एक चर्चा तेजी से आकार ले रही है—भाजपा के खिलाफ नाराजगी हो सकती है, लेकिन क्या कांग्रेस उस नाराजगी को अपने पक्ष में वोट में बदलने की स्थिति में है?
चुनाव में मुद्दे बनाम संगठन की ताकत
नगर निकाय चुनाव सिर्फ नाराजगी या लोकप्रियता के आधार पर नहीं जीते जाते। बूथ स्तर का संगठन, वार्डवार रणनीति, प्रत्याशियों की पकड़, लगातार जनसंपर्क और स्थानीय मुद्दों को मजबूती से उठाने की क्षमता भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करती है।
अगर भाजपा अपने संगठन को सक्रिय रखते हुए जनता के बीच पहुंचती है और कांग्रेस केवल चुनाव के समय सक्रिय होती है, तो सत्ता पक्ष को इसका सीधा फायदा मिल सकता है।
वहीं अगर कांग्रेस अभी से वार्ड स्तर पर सक्रिय होती है, जनता की समस्याओं को उठाती है और भाजपा के खिलाफ मौजूद नाराजगी को ठोस राजनीतिक मुद्दों में बदलने में सफल रहती है, तो मुकाबला पूरी तरह बदल सकता है।
असली फैसला डिंडौरी की जनता करेगी
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अगली बार नगर की सत्ता किसके हाथ में जाएगी। लेकिन इतना जरूर है कि डिंडौरी नगर का चुनाव केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं, बल्कि भाजपा के कामकाज बनाम विपक्ष की सक्रियता की लड़ाई भी बन सकता है।
भाजपा के लिए सवाल है कि वह नगर में अपने कामकाज को लेकर जनता की नाराजगी को कैसे दूर करती है।
वहीं कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह एक सक्रिय, आक्रामक और जमीन पर दिखाई देने वाली टीम तैयार कर पाएगी?
क्योंकि चुनाव में सिर्फ सत्ता पक्ष की कमजोरी काफी नहीं होती—विपक्ष को जनता का भरोसा जीतने के लिए मैदान में उतरना भी पड़ता है। अब देखना दिलचस्प होगा कि डिंडौरी नगर की जनता इस बार कामकाज को तवज्जो देती है, स्थानीय नाराजगी को वोट में बदलती है या फिर संगठनात्मक मजबूती के चलते एक बार फिर भाजपा के पक्ष में जनादेश जाता है।

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